इसलिये मैं उन परब्रह्म परमात्माकी शरणमें हूँ जो विश्वरहित होनेपर भी विश्वके रचयिता और विश्वस्वरूप हैं—साथ ही जो विश्वकी अन्तरात्माके रूपमें विश्वरूप सामग्रीसे क्रीड़ा भी करते रहते हैं, उन अजन्मा परमपदस्वरूप ब्रह्मको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २६॥✎ 664
सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम्।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम्॥ २६
इसलिये मैं उन परब्रह्म परमात्माकी शरणमें हूँ जो विश्वरहित होनेपर भी विश्वके रचयिता और विश्वस्वरूप हैं—साथ ही जो विश्वकी अन्तरात्माके रूपमें विश्वरूप सामग्रीसे क्रीड़ा भी करते रहते हैं, उन अजन्मा परमपदस्वरूप ब्रह्मको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.3.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 918) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/3/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)