श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.21

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-

मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।

अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-

मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे॥ २१

tamakṣaraṃ brahma paraṃ pareśa-

mavyaktamādhyātmikayogagamyam |

atīndriyaṃ sūkṣmamivātidūra-

manantamādyaṃ paripūrṇamīḍe|| 21

अर्थ

जो अविनाशी, सर्वशक्तिमान्, अव्यक्त, इन्द्रियातीत और अत्यन्त सूक्ष्म हैं; जो अत्यन्त निकट रहनेपर भी बहुत दूर जान पड़ते हैं; जो आध्यात्मिक योग अर्थात् ज्ञानयोग या भक्तियोगके द्वारा प्राप्त होते हैं—उन्हीं आदिपुरुष, अनन्त एवं परिपूर्ण परब्रह्म परमात्माकी मैं स्तुति करता हूँ॥ २१॥

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