श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.20

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं

वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्‍नाः।

अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं

गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः॥ २०

ekāntino yasya na kañcanārthaṃ

vāñchanti ye vai bhagavatprapannāḥ|

atyadbhutaṃ taccaritaṃ sumaṅgalaṃ

gāyanta ānandasamudramagnāḥ|| 20

अर्थ

जिनके अनन्यप्रेमी भक्तजन उन्हींकी शरणमें रहते हुए उनसे किसी भी वस्तुकी—यहाँतक कि मोक्षकी भी अभिलाषा नहीं करते, केवल उनकी परम दिव्य मंगलमयी लीलाओंका गान करते हुए आनन्दके समुद्रमें निमग्न रहते हैं॥ २०॥

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