गजेन्द्रके द्वारा भगवान्की स्तुति और उसका संकटसे मुक्त होना ✎ 659
श्रीशुक उवाच
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्॥ १
evaṃ vyavasito buddhyā samādhāya mano hṛdi|
jajāpa paramaṃ jāpyaṃ prāgjanmanyanuśikṣitam|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अपनी बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके गजेन्द्रने अपने मनको हृदयमें एकाग्र किया और फिर पूर्वजन्ममें सीखे हुए श्रेष्ठ स्तोत्रके जपद्वारा भगवान्की स्तुति करने लगा॥ १॥✎ 660
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अपनी बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके गजेन्द्रने अपने मनको हृदयमें एकाग्र किया और फिर पूर्वजन्ममें सीखे हुए श्रेष्ठ स्तोत्रके जपद्वारा भगवान्की स्तुति करने लगा॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.3.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 913) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/3/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)