श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.2.33

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यः कश्‍चनेशो बलिनोऽन्तकोरगात् प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम्।

भीतं प्रपन्‍नं परिपाति यद्भयान्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि॥ ३३✎ 1538

yaḥ kaścaneśo balino'ntakoragāt pracaṇḍavegādabhidhāvato bhṛśam|

bhītaṃ prapannaṃ paripāti yadbhayānmṛtyuḥ pradhāvatyaraṇaṃ tamīmahi|| 33

अर्थ

काल बड़ा बली है। यह साँपके समान बड़े प्रचण्ड वेगसे सबको निगल जानेके लिये दौड़ता ही रहता है। इससे अत्यन्त भयभीत होकर जो कोई भगवान्‌की शरणमें चला जाता है, उसे वे प्रभु अवश्य-अवश्य बचा लेते हैं। उनके भयसे भीत होकर मृत्यु भी अपना काम ठीक-ठीक पूरा करता है। वही प्रभु सबके आश्रय हैं। मैं उन्हींकी शरण ग्रहण करता हूँ’॥ ३३॥✎ 658

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे मन्वन्तरानुवर्णने
गजेन्द्रोपाख्याने द्वितीयोऽध्यायः
॥ २॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #658 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1538 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: यद्भया- न्मृत्यु: → यद्भयान्मृत्युः

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