॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.24.52
त्वं सर्वलोकस्य सुहृत् प्रियेश्वरो
ह्यात्मा गुरुर्ज्ञानमभीष्टसिद्धिः२।
तथापि लोको न भवन्तमन्धधी-
र्जानाति सन्तं हृदि बद्धकामः॥ ५२
tvaṃ sarvalokasya suhṛt priyeśvaro
hyātmā gururjñānamabhīṣṭasiddhiḥ|
tathāpi loko na bhavantamandhadhī-
rjānāti santaṃ hṛdi baddhakāmaḥ|| 52
अर्थ
आप सारे लोकके सुहृद्, प्रियतम, ईश्वर और आत्मा हैं। गुरु, उसके द्वारा प्राप्त होनेवाला ज्ञान और अभीष्टकी सिद्धि भी आपका ही स्वरूप है। फिर भी कामनाओंके बन्धनमें जकड़े जाकर लोग अंधे हो रहे हैं। उन्हें इस बातका पता ही नहीं है कि आप उनके हृदयमें ही विराजमान हैं॥ ५२॥✎ 1913
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—सिद्धिदः।