श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.52

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

त्वं सर्वलोकस्य सुहृत् प्रियेश्‍वरो

ह्यात्मा गुरुर्ज्ञानमभीष्टसिद्धिः२।

तथापि लोको न भवन्तमन्धधी-

र्जानाति सन्तं हृदि बद्धकामः॥ ५२

tvaṃ sarvalokasya suhṛt priyeśvaro

hyātmā gururjñānamabhīṣṭasiddhiḥ|

tathāpi loko na bhavantamandhadhī-

rjānāti santaṃ hṛdi baddhakāmaḥ|| 52

अर्थ

आप सारे लोकके सुहृद‍्, प्रियतम, ईश्‍वर और आत्मा हैं। गुरु, उसके द्वारा प्राप्त होनेवाला ज्ञान और अभीष्टकी सिद्धि भी आपका ही स्वरूप है। फिर भी कामनाओंके बन्धनमें जकड़े जाकर लोग अंधे हो रहे हैं। उन्हें इस बातका पता ही नहीं है कि आप उनके हृदयमें ही विराजमान हैं॥ ५२॥✎ 1913

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—सिद्धिदः।

    (मुद्रित पृष्ठ 1020)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1913 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): विराजमान् → विराजमान

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें