श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.51

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

जनो जनस्यादिशतेऽसतीं मतिं१

यया प्रपद्येत दुरत्ययं तमः।

त्वं त्वव्ययं ज्ञानममोघमञ्जसा

प्रपद्यते येन जनो निजं पदम्॥ ५१

jano janasyādiśate'satīṃ matiṃ

yayā prapadyeta duratyayaṃ tamaḥ|

tvaṃ tvavyayaṃ jñānamamoghamañjasā

prapadyate yena jano nijaṃ padam|| 51

अर्थ

अज्ञानी मनुष्य अज्ञानियोंको जिस ज्ञानका उपदेश करता है वह तो अज्ञान ही है। उसके द्वारा संसाररूप घोर अन्धकारकी अधिकाधिक प्राप्ति होती है। परन्तु आप तो उस अविनाशी और अमोघ ज्ञानका उपदेश करते हैं जिससे मनुष्य अनायास ही अपने वास्तविक स्वरूपको प्राप्त कर लेता है॥ ५१॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—गतिं।

    (मुद्रित पृष्ठ 1020)

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