॥ श्रीहरिः ॥
अहं त्वामृषिभिः साकं सहनावमुदन्वति।
विकर्षन् विचरिष्यामि यावद् ब्राह्मी निशा प्रभो॥ ३७
ahaṃ tvāmṛṣibhiḥ sākaṃ sahanāvamudanvati|
vikarṣan vicariṣyāmi yāvad brāhmī niśā prabho|| 37
अर्थ
सत्यव्रत! इसके बाद जबतक ब्रह्माजीकी रात रहेगी तबतक मैं ऋषियोंके साथ तुम्हें उस नावमें बैठाकर उसे खींचता हुआ समुद्रमें विचरण करूँगा॥ ३७॥
अहं त्वामृषिभिः साकं सहनावमुदन्वति।
विकर्षन् विचरिष्यामि यावद् ब्राह्मी निशा प्रभो॥ ३७
सत्यव्रत! इसके बाद जबतक ब्रह्माजीकी रात रहेगी तबतक मैं ऋषियोंके साथ तुम्हें उस नावमें बैठाकर उसे खींचता हुआ समुद्रमें विचरण करूँगा॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1018) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/24/37/