श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् अपने अनन्य प्रेमी भक्तोंपर अत्यन्त प्रेम करते हैं। जब जगत्पति मत्स्यभगवान्ने अपने प्यारे भक्त राजर्षि सत्यव्रतकी यह प्रार्थना सुनी तो उनका प्रिय और हित करनेके लिये, साथ ही कल्पान्तके प्रलयकालीन समुद्रमें विहार करनेके लिये उनसे कहा॥ ३१॥✎ 835
इति ब्रुवाणं नृपतिं जगत्पतिः
सत्यव्रतं मत्स्यवपुर्युगक्षये।
विहर्तुकामः प्रलयार्णवेऽब्रवी-
च्चिकीर्षुरेकान्तजनप्रियः प्रियम्॥ ३१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् अपने अनन्य प्रेमी भक्तोंपर अत्यन्त प्रेम करते हैं। जब जगत्पति मत्स्यभगवान्ने अपने प्यारे भक्त राजर्षि सत्यव्रतकी यह प्रार्थना सुनी तो उनका प्रिय और हित करनेके लिये, साथ ही कल्पान्तके प्रलयकालीन समुद्रमें विहार करनेके लिये उनसे कहा॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1017) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/24/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#835 शब्दोंके बीचका स्थान: मत्स्यभगवान् ने → मत्स्यभगवान्ने