श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.31

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति ब्रुवाणं नृपतिं जगत्पतिः

सत्यव्रतं मत्स्यवपुर्युगक्षये।

विहर्तुकामः प्रलयार्णवेऽब्रवी-

च्चिकीर्षुरेकान्तजनप्रियः प्रियम्॥ ३१

iti bruvāṇaṃ nṛpatiṃ jagatpatiḥ

satyavrataṃ matsyavapuryugakṣaye|

vihartukāmaḥ pralayārṇave'bravī-

ccikīrṣurekāntajanapriyaḥ priyam|| 31

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् अपने अनन्य प्रेमी भक्तोंपर अत्यन्त प्रेम करते हैं। जब जगत्पति मत्स्यभगवान्‌ने अपने प्यारे भक्त राजर्षि सत्यव्रतकी यह प्रार्थना सुनी तो उनका प्रिय और हित करनेके लिये, साथ ही कल्पान्तके प्रलयकालीन समुद्रमें विहार करनेके लिये उनसे कहा॥ ३१॥✎ 835

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #835 शब्दोंके बीचका स्थान: मत्स्यभगवान् ने → मत्स्यभगवान्‌ने

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