॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.24.30
न तेऽरविन्दाक्ष पदोपसर्पणं
मृषा भवेत् सर्वसुहृत्प्रियात्मनः।
यथेतरेषां पृथगात्मनां सता-
मदीदृशो यद् वपुरद्भुतं हि नः॥ ३०
na te'ravindākṣa padopasarpaṇaṃ
mṛṣā bhavet sarvasuhṛtpriyātmanaḥ|
yathetareṣāṃ pṛthagātmanāṃ satā-
madīdṛśo yad vapuradbhutaṃ hi naḥ|| 30
अर्थ
कमलनयन प्रभो! जैसे देहादि अनात्मपदार्थोंमें अपनेपनका अभिमान करनेवाले संसारी पुरुषोंका आश्रय व्यर्थ होता है, उस प्रकार आपके चरणोंकी शरण तो व्यर्थ हो नहीं सकती; क्योंकि आप सबके अहैतुक प्रेमी, परम प्रियतम और आत्मा हैं। आपने इस समय जो रूप धारण करके हमें दर्शन दिया है, यह बड़ा ही अद्भुत है॥ ३०॥