भगवन्! मत्स्ययोनि एक तो यों ही लोकनिन्दित है, दूसरे तमोगुणी और असह्य परतन्त्रतासे युक्त भी है। सर्वशक्तिमान् होनेपर भी भगवान्ने कर्मबन्धनमें बँधे हुए जीवकी तरह यह मत्स्यका रूप क्यों धारण किया?॥ २॥✎ 830
यदर्थमदधाद् रूपं मात्स्यं लोकजुगुप्सितम्।
तमःप्रकृति दुर्मर्षं कर्मग्रस्त इवेश्वरः॥ २
भगवन्! मत्स्ययोनि एक तो यों ही लोकनिन्दित है, दूसरे तमोगुणी और असह्य परतन्त्रतासे युक्त भी है। सर्वशक्तिमान् होनेपर भी भगवान्ने कर्मबन्धनमें बँधे हुए जीवकी तरह यह मत्स्यका रूप क्यों धारण किया?॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1014) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/24/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)