श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.3

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्युक्‍त्वा हरिमानम्य ब्रह्माणं सभवं ततः।

विवेश सुतलं प्रीतो बलिर्मुक्तः सहासुरैः॥ ३

ityuktvā harimānamya brahmāṇaṃ sabhavaṃ tataḥ|

viveśa sutalaṃ prīto balirmuktaḥ sahāsuraiḥ|| 3

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! यों कहते ही बलि वरुणके पाशोंसे मुक्त हो गये। तब उन्होंने भगवान्, ब्रह्माजी और शंकरजीको प्रणाम किया और इसके बाद बड़ी प्रसन्‍नतासे असुरोंके साथ सुतल लोककी यात्रा की॥ ३॥✎ 819 820

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #819 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #820 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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