॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.22.9
किमात्मनानेन जहाति योऽन्ततः
किं रिक्थहारैः स्वजनाख्यदस्युभिः।
किं जायया संसृतिहेतुभूतया
मर्त्यस्य गेहैः किमिहायुषो व्ययः॥ ९
kimātmanānena jahāti yo'ntataḥ
kiṃ rikthahāraiḥ svajanākhyadasyubhiḥ|
kiṃ jāyayā saṃsṛtihetubhūtayā
martyasya gehaiḥ kimihāyuṣo vyayaḥ|| 9
अर्थ
उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि शरीरको लेकर क्या करना है, जब यह एक-न-एक दिन साथ छोड़ ही देता है। जो धन-सम्पत्ति लेनेके लिये स्वजन बने हुए हैं, उन डाकुओंसे अपना स्वार्थ ही क्या है? पत्नीसे भी क्या लाभ है, जब वह जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्रमें डालनेवाली ही है। जब मर ही जाना है, तब घरसे मोह करनेमें भी क्या स्वार्थ है? इन सब वस्तुओंमें उलझ जाना तो केवल अपनी आयु खो देना है॥ ९॥