॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.22.10
इत्थं स निश्चित्य पितामहो महा-
नगाधबोधो भवतः पादपद्मम्।
ध्रुवं प्रपेदे ह्यकुतोभयं जनाद्
भीतः स्वपक्षक्षपणस्य सत्तमः॥ १०
itthaṃ sa niścitya pitāmaho mahā-
nagādhabodho bhavataḥ pādapadmam|
dhruvaṃ prapede hyakutobhayaṃ janād
bhītaḥ svapakṣakṣapaṇasya sattamaḥ|| 10
अर्थ
ऐसा निश्चय करके मेरे पितामह प्रह्लादजीने, यह जानते हुए भी कि आप लौकिक दृष्टिसे उनके भाई-बन्धुओंके नाश करनेवाले शत्रु हैं, फिर आपके ही भयरहित एवं अविनाशी चरणकमलोंकी शरण ग्रहण की थी। क्यों न हो—वे संसारसे परम विरक्त, अगाध बोधसम्पन्न, उदारहृदय एवं संत-शिरोमणि जो हैं॥ १०॥