श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.2

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

बलिरुवाच

यद्युत्तमश्लोक भवान् ममेरितं

वचो व्यलीकं सुरवर्य मन्यते।

करोम्यृतं तन्‍न भवेत् प्रलम्भनं

पदं तृतीयं कुरु शीर्ष्णि मे निजम्॥ २

yadyuttamaśloka bhavān mameritaṃ

vaco vyalīkaṃ suravarya manyate|

karomyṛtaṃ tanna bhavet pralambhanaṃ

padaṃ tṛtīyaṃ kuru śīrṣṇi me nijam|| 2

अर्थ

दैत्यराज बलिने कहा—देवताओंके आराध्यदेव! आपकी कीर्ति बड़ी पवित्र है। क्या आप मेरी बातको असत्य समझते हैं? ऐसा नहीं है। मैं उसे सत्य कर दिखाता हूँ। आप धोखेमें नहीं पड़ेंगे। आप कृपा करके अपना तीसरा पग मेरे सिरपर रख दीजिये॥ २॥

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