श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अथ द्वाविंशोऽध्यायः✎ 1837

बलिके द्वारा भगवान्‌की स्‍तुति और भगवान्‌का उसपर प्रसन्‍न होना✎ 811 812

श्रीशुक उवाच

एवं विप्रकृतो राजन् बलिर्भगवतासुरः।

भिद्यमानोऽप्यभिन्‍नात्मा प्रत्याहाविक्लवं वचः॥ १

evaṃ viprakṛto rājan balirbhagavatāsuraḥ|

bhidyamāno'pyabhinnātmā pratyāhāviklavaṃ vacaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार भगवान्‌ने असुरराज बलिका बड़ा तिरस्कार किया और उन्हें धैर्यसे विचलित करना चाहा। परन्तु वे तनिक भी विचलित न हुए, बड़े धैर्यसे बोले॥ १॥✎ 813

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #813 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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