श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.19

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

हे विप्रचित्ते हे राहो हे नेमे श्रूयतां वचः।

मा युध्यत निवर्तध्वं न नः कालोऽयमर्थकृत्॥ १९

he vipracitte he rāho he neme śrūyatāṃ vacaḥ|

mā yudhyata nivartadhvaṃ na naḥ kālo'yamarthakṛt|| 19

अर्थ

उन्होंने विप्रचित्ति, राहु, नेमि आदि दैत्योंको सम्बोधित करके कहा—‘भाइयो! मेरी बात सुनो। लड़ो मत, वापस लौट आओ। यह समय हमारे कार्यके अनुकूल नहीं है॥ १९॥✎ 809 1628

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #809 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्‌को
  • #1628 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌को → वामनभगवान्‌को

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