श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.18

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

हन्यमानान् स्वकान् दृष्ट्वा पुरुषानुचरैर्बलिः।

वारयामास संरब्धान् काव्यशापमनुस्मरन्॥ १८

hanyamānān svakān dṛṣṭvā puruṣānucarairbaliḥ|

vārayāmāsa saṃrabdhān kāvyaśāpamanusmaran|| 18

अर्थ

जब राजा बलिने देखा कि भगवान्‌के पार्षद मेरे सैनिकोंको मार रहे हैं और वे भी क्रोधमें भरकर उनसे लड़नेके लिये तैयार हो रहे हैं, तो उन्होंने शुक्राचार्यके शापका स्मरण करके उन्हें युद्ध करनेसे रोक दिया॥ १८॥✎ 809 1628

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #809 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्‌को
  • #1628 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌को → वामनभगवान्‌को

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