श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.13

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तस्मादस्य वधो धर्मो भर्तुः शुश्रूषणं च नः।

इत्यायुधानि जगृहुर्बलेरनुचरासुराः॥ १३

tasmādasya vadho dharmo bhartuḥ śuśrūṣaṇaṃ ca naḥ|

ityāyudhāni jagṛhurbaleranucarāsurāḥ|| 13

अर्थ

ऐसी अवस्थामें हमलोगोंका यही धर्म है कि इस शत्रुको मार डालें। इससे हमारे स्वामी बलिकी सेवा भी होती है।’ यों सोचकर राजा बलिके अनुचर असुरोंने अपने-अपने हथियार उठा लिये॥ १३॥✎ 809 1628

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #809 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्‌को
  • #1628 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌को → वामनभगवान्‌को

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