श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

स्पर्शे च कामं नृप रेतसोऽम्भः

पृष्ठे त्वधर्मं क्रमणेषु यज्ञम्।

छायासु मृत्युं हसिते च मायां

तनूरुहेष्वोषधिजातयश्‍च ॥ २८

sparśe ca kāmaṃ nṛpa retaso'mbhaḥ

pṛṣṭhe tvadharmaṃ kramaṇeṣu yajñam|

chāyāsu mṛtyuṃ hasite ca māyāṃ

tanūruheṣvoṣadhijātayaśca || 28

अर्थ

परीक्षित्! उनके स्पर्शमें काम, वीर्यमें जल, पीठमें अधर्म, पदविन्यासमें यज्ञ, छायामें मृत्यु, हँसीमें माया और शरीरके रोमोंमें सब प्रकारकी ओषधियाँ थीं॥ २८॥

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