श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.26

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

इन्द्रप्रधानानमरान्भुजेषु

तत्कर्णयोः ककुभो द्यौश्‍च मूर्ध्नि।

केशेषु मेघाञ्छ्वसनं नासिकाया-

मक्ष्णोश्‍च सूर्यं वदने च वह्निम्॥ २६

indrapradhānānamarānbhujeṣu

tatkarṇayoḥ kakubho dyauśca mūrdhni|

keśeṣu meghāñchvasanaṃ nāsikāyā-

makṣṇośca sūryaṃ vadane ca vahnim|| 26

अर्थ

बाहुओंमें इन्द्रादि समस्त देवगण, कानोंमें दिशाएँ, मस्तकमें स्वर्ग, केशोंमें मेघमाला, नासिकामें वायु, नेत्रोंमें सूर्य और मुखमें अग्‍नि दिखायी पड़े॥ २६॥

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