॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.2.18
कुन्दैः कुरबकाशोकैः शिरीषैः कुट३जेङ्गुदैः।
कुब्जकैः स्वर्णयूथीभिर्नागपुन्नागजातिभिः॥ १८
kundaiḥ kurabakāśokaiḥ śirīṣaiḥ kuṭajeṅgudaiḥ|
kubjakaiḥ svarṇayūthībhirnāgapunnāgajātibhiḥ|| 18
अर्थ
कुन्द, कुरबक (कटसरैया), अशोक, सिरस, वनमल्लिका, लिसौड़ा, हरसिंगार, सोनजूही, नाग, पुन्नाग, जाती, मल्लिका, शतपत्र, माधवी और मोगरा आदि सुन्दर-सुन्दर पुष्पवृक्ष एवं तटके दूसरे वृक्षोंसे भी—जो प्रत्येक ऋतुमें हरे-भरे रहते थे—वह सरोवर शोभायमान रहता था॥ १८-१९॥
टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—कुटजद्रुमैः।