॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.19.4
न सन्ति तीर्थे युधि चार्थिनार्थिताः
पराङ्मुखा ये त्वमनस्विनो नृपाः।
युष्मत्कुले यद्यशसामलेन
प्रह्राद उद्भाति यथोडुपः खे॥ ४ ✎ 1119
na santi tīrthe yudhi cārthinārthitāḥ
parāṅmukhā ye tvamanasvino nṛpāḥ|
yuṣmatkule yadyaśasāmalena
prahrāda udbhāti yathoḍupaḥ khe|| 4
अर्थ
दानके अवसरपर याचकोंकी याचना सुनकर और युद्धके अवसरपर शत्रुके ललकारनेपर उनकी ओरसे मुँह मोड़ लेनेवाला कायर आपके वंशमें कोई भी नहीं हुआ। क्यों न हो, आपकी कुलपरम्परामें प्रह्लाद अपने निर्मल यशसे वैसे ही शोभायमान होते हैं, जैसे आकाशमें चन्द्रमा॥ ४॥