श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्युक्तः स हसन्‍नाह वाञ्छातः प्रतिगृह्यताम्।

वामनाय महीं दातुं जग्राह जलभाजनम्॥ २८

ityuktaḥ sa hasannāha vāñchātaḥ pratigṛhyatām|

vāmanāya mahīṃ dātuṃ jagrāha jalabhājanam|| 28

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान्‌के इस प्रकार कहनेपर राजा बलि हँस पड़े। उन्होंने कहा—‘अच्छी बात है; जितनी तुम्हारी इच्छा हो, उतनी ही ले लो।’ यों कहकर वामनभगवान्‌को तीन पग पृथ्वीका संकल्प करनेके लिये उन्होंने जलपात्र उठाया॥ २८॥✎ 795 796

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #795 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #796 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को

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