nainaḥ prāpnoti vai vidvānyāvadarthapratigrahaḥ|| 17
अर्थ
माना कि आप सारे जगत्के स्वामी और बड़े उदार हैं, फिर भी मैं आपसे इससे अधिक नहीं चाहता। विद्वान् पुरुषको केवल अपनी आवश्यकताके अनुसार ही दान स्वीकार करना चाहिये। इससे वह प्रतिग्रहजन्य पापसे बच जाता है॥ १७॥✎ 793
नान्यत् ते कामये राजन्वदान्याज्जगदीश्वरात्।
नैनः प्राप्नोति वै विद्वान्यावदर्थप्रतिग्रहः॥ १७
माना कि आप सारे जगत्के स्वामी और बड़े उदार हैं, फिर भी मैं आपसे इससे अधिक नहीं चाहता। विद्वान् पुरुषको केवल अपनी आवश्यकताके अनुसार ही दान स्वीकार करना चाहिये। इससे वह प्रतिग्रहजन्य पापसे बच जाता है॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 994) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#793 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् को → विष्णुभगवान्को