श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.24

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

मौञ्ज्या मेखलया वीतमुपवीताजिनोत्तरम्।

जटिलं वामनं विप्रं मायामाणवकं हरिम्॥ २४

mauñjyā mekhalayā vītamupavītājinottaram|

jaṭilaṃ vāmanaṃ vipraṃ māyāmāṇavakaṃ harim|| 24

अर्थ

वे कमरमें मूँजकी मेखला और गलेमें यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। बगलमें मृगचर्म था और सिरपर जटा थी। इसी प्रकार बौने ब्राह्मणके वेषमें अपनी मायासे ब्रह्मचारी बने हुए भगवान्‌ने जब उनके यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया, तब भृगुवंशी ब्राह्मण उन्हें देखकर अपने शिष्योंके साथ उनके तेजसे प्रभावित एवं निष्प्रभ हो गये। वे सब-के-सब अग्‍नियोंके साथ उठ खड़े हुए और उन्होंने वामनभगवान्‌का स्वागत-सत्कार किया॥ २४-२५॥✎ 786 787 788 789

यह अर्थ श्लोक 24–25 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #786 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को
  • #787 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #788 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् ने → वामनभगवान्‌ने
  • #789 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को

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