श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.23

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

इत्थं सशिष्येषु भृगुष्वनेकधा

वितर्क्यमाणो भगवान्स वामनः।

छत्रं सदण्डं सजलं कमण्डलुं

विवेश बिभ्रद्धयमेधवाटम्॥ २३

itthaṃ saśiṣyeṣu bhṛguṣvanekadhā

vitarkyamāṇo bhagavānsa vāmanaḥ|

chatraṃ sadaṇḍaṃ sajalaṃ kamaṇḍaluṃ

viveśa bibhraddhayamedhavāṭam|| 23

अर्थ

भृगुके पुत्र शुक्राचार्य आदि अपने शिष्योंके साथ इसी प्रकार अनेकों कल्पनाएँ कर रहे थे। उसी समय हाथमें छत्र, दण्ड और जलसे भरा कमण्डलु लिये हुए वामनभगवान्‌ने अश्‍वमेध यज्ञके मण्डपमें प्रवेश किया॥ २३॥✎ 786 787 788 789

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #786 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को
  • #787 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #788 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् ने → वामनभगवान्‌ने
  • #789 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को

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