श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.17.2

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

चिन्तयन्त्येकया बुद्ध्या महापुरुषमीश्‍वरम्।

प्रगृह्येन्द्रियदुष्टाश्वान्मनसा बुद्धिसारथिः॥ २

cintayantyekayā buddhyā mahāpuruṣamīśvaram|

pragṛhyendriyaduṣṭāśvānmanasā buddhisārathiḥ|| 2

अर्थ

बुद्धिको सारथि बनाकर मनकी लगामसे उसने इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़ोंको अपने वशमें कर लिया और एकनिष्ठ बुद्धिसे वह पुरुषोत्तम भगवान्‌का चिन्तन करती रही॥ २॥✎ 769 770 771 772

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #769 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #770 शब्दोंके बीचका स्थान: यज्ञेश्‍वर-भगवान् को → यज्ञेश्‍वर-भगवान्‌को
  • #771 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #772 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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