॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.17.10
आयुः परं वपुरभीष्टमतुल्यलक्ष्मी-
र्द्यौभूरसाः सकलयोगगुणास्त्रिवर्गः।
ज्ञानं च केवलमनन्त भवन्ति तुष्टात्
त्वत्तो नृणां किमु सपत्नजयादिराशीः॥ १०
āyuḥ paraṃ vapurabhīṣṭamatulyalakṣmī-
rdyaubhūrasāḥ sakalayogaguṇāstrivargaḥ|
jñānaṃ ca kevalamananta bhavanti tuṣṭāt
tvatto nṛṇāṃ kimu sapatnajayādirāśīḥ|| 10
अर्थ
प्रभो! अनन्त! जब आप प्रसन्न हो जाते हैं, तब मनुष्योंको ब्रह्माजीकी दीर्घ आयु, उनके ही समान दिव्य शरीर, प्रत्येक अभीष्ट वस्तु, अतुलित धन, स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल, योगकी समस्त सिद्धियाँ, अर्थ-धर्म-कामरूप त्रिवर्ग और केवल ज्ञानतक प्राप्त हो जाता है। फिर शत्रुओंपर विजय प्राप्त करना आदि जो छोटी-छोटी कामनाएँ हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ १०॥