॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.16.61
त एव नियमाः साक्षात्त एव च यमोत्तमाः।
तपो दानं व्रतं यज्ञो येन तुष्यत्यधोक्षजः॥ ६१
ta eva niyamāḥ sākṣātta eva ca yamottamāḥ|
tapo dānaṃ vrataṃ yajño yena tuṣyatyadhokṣajaḥ|| 61
अर्थ
जिनसे भगवान् प्रसन्न हों—वे ही सच्चे नियम हैं, वे ही उत्तम यम हैं, वे ही वास्तवमें तपस्या, दान, व्रत और यज्ञ हैं॥ ६१॥