॥ श्रीहरिः ॥
नृत्यवादित्रगीतैश्च स्तुतिभिः स्वस्तिवाचकैः।
कारयेत्त३त्कथाभिश्च पूजां भगवतोऽन्वहम्॥ ५७
nṛtyavāditragītaiśca stutibhiḥ svastivācakaiḥ|
kārayettatkathābhiśca pūjāṃ bhagavato'nvaham|| 57
अर्थ
प्रतिपदासे लेकर त्रयोदशीतक प्रतिदिन नाच-गान, बाजे-गाजे, स्तुति, स्वस्तिवाचन और भगवत्कथाओंसे भगवान्की पूजा करे-करावे॥ ५७॥✎ 765
नृत्यवादित्रगीतैश्च स्तुतिभिः स्वस्तिवाचकैः।
कारयेत्तत्कथाभिश्च पूजां भगवतोऽन्वहम्॥ ५७
प्रतिपदासे लेकर त्रयोदशीतक प्रतिदिन नाच-गान, बाजे-गाजे, स्तुति, स्वस्तिवाचन और भगवत्कथाओंसे भगवान्की पूजा करे-करावे॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 984) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/57/टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—‘त्सत्कथा०।
(मुद्रित पृष्ठ 984)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #765 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की