॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.16.56
भुक्तवत्सु च सर्वेषु दीनान्धकृपणेषु२ च।
विष्णोस्तत्प्रीणनं विद्वान्भुञ्जीत सह बन्धुभिः॥ ५६
bhuktavatsu ca sarveṣu dīnāndhakṛpaṇeṣu ca|
viṣṇostatprīṇanaṃ vidvānbhuñjīta saha bandhubhiḥ|| 56
अर्थ
गुरु और ऋत्विजोंको यथायोग्य दक्षिणा देनी चाहिये। जो चाण्डाल आदि अपने-आप वहाँ आ गये हों, उन सभीको तथा दीन, अंधे और असमर्थ पुरुषोंको भी अन्न आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये। जब सब लोग खा चुकें, तब उन सबके सत्कारको भगवान्की प्रसन्नताका साधन समझते हुए अपने भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे॥ ५५-५६॥✎ 764
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—कृपणादिषु।