इसके बाद ज्ञानसम्पन्न आचार्य और ऋत्विजोंको वस्त्र, आभूषण और गौ आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये। प्रिये! इसे भी भगवान्की ही आराधना समझो॥ ५३॥✎ 763
आचार्यं ज्ञानसम्पन्नं वस्त्राभरणधेनुभिः।
तोषयेदृत्विजश्चैव तद्विद्ध्याराधनं हरेः॥ ५३
इसके बाद ज्ञानसम्पन्न आचार्य और ऋत्विजोंको वस्त्र, आभूषण और गौ आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये। प्रिये! इसे भी भगवान्की ही आराधना समझो॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 983) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/53/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)