अत्यन्त एकाग्रचित्तसे उसी पकाये हुए चरुके द्वारा भगवान्का यजन करना चाहिये और उनको प्रसन्न करनेवाला गुणयुक्त तथा स्वादिष्ट नैवेद्य अर्पण करना चाहिये॥ ५२॥
शृतेन तेन पुरुषं यजेत सुसमाहितः।
नैवेद्यं चातिगुणवद् दद्यात्पुरुषतुष्टिदम्॥ ५२
अत्यन्त एकाग्रचित्तसे उसी पकाये हुए चरुके द्वारा भगवान्का यजन करना चाहिये और उनको प्रसन्न करनेवाला गुणयुक्त तथा स्वादिष्ट नैवेद्य अर्पण करना चाहिये॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 983) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/52/