॥ श्रीहरिः ॥
अन्ववर्तन्त यं देवाः श्रीश्च त३त्पादपद्मयोः।
स्पृहयन्त इवामोदं भगवान्मे प्रसीदताम्॥ ३७
anvavartanta yaṃ devāḥ śrīśca tatpādapadmayoḥ|
spṛhayanta ivāmodaṃ bhagavānme prasīdatām|| 37
अर्थ
जिनके चरणकमलोंकी सुगन्ध प्राप्त करनेकी लालसासे समस्त देवता और स्वयं लक्ष्मीजी भी सेवामें लगी रहती हैं, वे भगवान् मुझपर प्रसन्न हों’॥ ३७॥
अन्ववर्तन्त यं देवाः श्रीश्च तत्पादपद्मयोः।
स्पृहयन्त इवामोदं भगवान्मे प्रसीदताम्॥ ३७
जिनके चरणकमलोंकी सुगन्ध प्राप्त करनेकी लालसासे समस्त देवता और स्वयं लक्ष्मीजी भी सेवामें लगी रहती हैं, वे भगवान् मुझपर प्रसन्न हों’॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 982) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/37/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—यत्पा०।
(मुद्रित पृष्ठ 982)