आप अव्यक्त और सूक्ष्म हैं। प्रकृति और पुरुषके रूपमें भी आप ही स्थित हैं। आप चौबीस गुणोंके जाननेवाले और गुणोंकी संख्या करनेवाले सांख्यशास्त्रके प्रवर्तक हैं। आपको मेरा नमस्कार है॥ ३०॥✎ 752753
नमोऽव्यक्ताय सूक्ष्माय प्रधानपुरुषाय च।
चतुर्विंशद्गुणज्ञाय गुणसंख्यानहेतवे॥ ३०
आप अव्यक्त और सूक्ष्म हैं। प्रकृति और पुरुषके रूपमें भी आप ही स्थित हैं। आप चौबीस गुणोंके जाननेवाले और गुणोंकी संख्या करनेवाले सांख्यशास्त्रके प्रवर्तक हैं। आपको मेरा नमस्कार है॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 981) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)