श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.29

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महीयसे।

सर्वभूतनिवासाय वासुदेवाय साक्षिणे॥ २९

namastubhyaṃ bhagavate puruṣāya mahīyase|

sarvabhūtanivāsāya vāsudevāya sākṣiṇe|| 29

अर्थ

(और इस प्रकार स्तुति करे—) ‘प्रभो! आप सर्वशक्तिमान् हैं। अन्तर्यामी और आराधनीय हैं। समस्त प्राणी आपमें और आप समस्त प्राणियोंमें निवास करते हैं। इसीसे आपको ‘वासुदेव’ कहते हैं। आप समस्त चराचर जगत् और उसके कारणके भी साक्षी हैं। भगवन्! मेरा आपको नमस्कार है॥ २९॥✎ 752 753

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #752 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #753 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् ने → वराहभगवान्‌ने

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