उन यज्ञोंके प्रभावसे बलिकी कीर्तिकौमुदी तीनों लोकोंसे बाहर भी दसों दिशाओंमें फैल गयी और वे नक्षत्रोंके राजा चन्द्रमाके समान शोभायमान हुए॥ ३५॥
ततस्तदनुभावेन भुवनत्रयविश्रुताम्।
कीर्तिं दिक्षु वितन्वानः स रेज उडुराडिव॥ ३५
उन यज्ञोंके प्रभावसे बलिकी कीर्तिकौमुदी तीनों लोकोंसे बाहर भी दसों दिशाओंमें फैल गयी और वे नक्षत्रोंके राजा चन्द्रमाके समान शोभायमान हुए॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.15.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 978) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/15/35/