श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.32

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

एवं सुमन्त्रितार्थास्ते गुरुणार्थानुदर्शिना।

हित्वा त्रिविष्टपं जग्मुर्गीर्वाणाः कामरूपिणः॥ ३२

evaṃ sumantritārthāste guruṇārthānudarśinā|

hitvā triviṣṭapaṃ jagmurgīrvāṇāḥ kāmarūpiṇaḥ|| 32

अर्थ

बृहस्पतिजी देवताओंके समस्त स्वार्थ और परमार्थके ज्ञाता थे। उन्होंने जब इस प्रकार देवताओंको सलाह दी, तब वे स्वेच्छानुसार रूप धारण करके स्वर्ग छोड़कर चले गये॥ ३२॥✎ 747

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #747 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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