बृहस्पतिजी देवताओंके समस्त स्वार्थ और परमार्थके ज्ञाता थे। उन्होंने जब इस प्रकार देवताओंको सलाह दी, तब वे स्वेच्छानुसार रूप धारण करके स्वर्ग छोड़कर चले गये॥ ३२॥✎ 747
एवं सुमन्त्रितार्थास्ते गुरुणार्थानुदर्शिना।
हित्वा त्रिविष्टपं जग्मुर्गीर्वाणाः कामरूपिणः॥ ३२
बृहस्पतिजी देवताओंके समस्त स्वार्थ और परमार्थके ज्ञाता थे। उन्होंने जब इस प्रकार देवताओंको सलाह दी, तब वे स्वेच्छानुसार रूप धारण करके स्वर्ग छोड़कर चले गये॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.15.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 977) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/15/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)