श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.2

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

एतद् वेदितुमिच्छामो महत् कौतूहलं हि नः।

यज्ञेश्‍वरस्य पूर्णस्य बन्धनं चाप्यनागसः॥ २

etad veditumicchāmo mahat kautūhalaṃ hi naḥ|

yajñeśvarasya pūrṇasya bandhanaṃ cāpyanāgasaḥ|| 2

अर्थ

मेरे हृदयमें इस बातका बड़ा कौतूहल है कि स्वयं परिपूर्ण यज्ञेश्‍वरभगवान्‌के द्वारा याचना और निरपराधका बन्धन—ये दोनों ही कैसे सम्भव हुए? हमलोग यह जानना चाहते हैं॥ २॥

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