श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.14.7

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

इन्द्रो भगवता दत्तां त्रैलोक्यश्रियमूर्जिताम्।

भुञ्जानः पाति लोकांस्त्रीन् कामं लोके प्रवर्षति॥ ७

indro bhagavatā dattāṃ trailokyaśriyamūrjitām|

bhuñjānaḥ pāti lokāṃstrīn kāmaṃ loke pravarṣati|| 7

अर्थ

इन्द्र भगवान्‌की दी हुई त्रिलोकीकी अतुल सम्पत्तिका उपभोग और प्रजाका पालन करते हैं। संसारमें यथेष्ट वर्षा करनेका अधिकार भी उन्हींको है॥ ७॥✎ 744 745 746

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #744 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #745 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #746 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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