श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.14.6

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

पालयन्ति प्रजापाला यावदन्तं विभागशः।

यज्ञभागभुजो देवा ये च त२त्रान्विताश्‍च तैः॥ ६

pālayanti prajāpālā yāvadantaṃ vibhāgaśaḥ|

yajñabhāgabhujo devā ye ca tatrānvitāśca taiḥ|| 6

अर्थ

मनुपुत्र मन्वन्तरभर काल और देश दोनोंका विभाग करके प्रजापालन तथा धर्मपालनका कार्य करते हैं। पंच-महायज्ञ आदि कर्मोंमें जिन ऋषि, पितर, भूत और मनुष्य आदिका सम्बन्ध है—उनके साथ देवता उस मन्वन्तरमें यज्ञका भाग स्वीकार करते हैं॥ ६॥✎ 744 745 746

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—यत्रा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 973)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #744 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #745 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #746 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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