श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.14.10

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

स्तूयमानो जनैरेभिर्मायया नामरूपया।

विमोहितात्मभिर्नानादर्शनैर्न च दृश्यते॥ १०

stūyamāno janairebhirmāyayā nāmarūpayā|

vimohitātmabhirnānādarśanairna ca dṛśyate|| 10

अर्थ

नाम और रूपकी मायासे प्राणियोंकी बुद्धि विमूढ़ हो रही है। इसलिये वे अनेक प्रकारके दर्शनशास्त्रोंके द्वारा महिमा तो भगवान्‌की ही गाते हैं, परन्तु उनके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान पाते॥ १०॥✎ 744 745 746

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #744 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #745 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #746 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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