श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.22

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तां वीक्ष्य देव इति कन्दुकलीलयेषद्-

व्रीडास्फुटस्मितविसृष्टकटाक्षमुष्टः।

स्त्रीप्रेक्षणप्रतिसमीक्षणविह्वलात्मा

नात्मानमन्तिक उमां स्वगणांश्‍च वेद॥ २२

tāṃ vīkṣya deva iti kandukalīlayeṣad-

vrīḍāsphuṭasmitavisṛṣṭakaṭākṣamuṣṭaḥ|

strīprekṣaṇapratisamīkṣaṇavihvalātmā

nātmānamantika umāṃ svagaṇāṃśca veda|| 22

अर्थ

गेंदसे खेलते-खेलते उसने तनिक सलज्जभावसे मुसकराकर तिरछी नजरसे शंकरजीकी ओर देखा। बस, उनका मन हाथसे निकल गया। वे मोहिनीको निहारने और उसकी चितवनके रसमें डूबकर इतने विह्वल हो गये कि उन्हें अपने-आपकी भी सुधि न रही। फिर पास बैठी हुई सती और गणोंकी तो याद ही कैसे रहती॥ २२॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें