श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.15

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

कौतूहलाय दैत्यानां योषिद्वेषो मया कृतः।

पश्यता सुरकार्याणि गते पीयूषभाजने॥ १५

kautūhalāya daityānāṃ yoṣidveṣo mayā kṛtaḥ|

paśyatā surakāryāṇi gate pīyūṣabhājane|| 15

अर्थ

श्रीविष्णुभगवान्‌ने कहा—शंकरजी! उस समय अमृतका कलश दैत्योंके हाथमें चला गया था। अतः देवताओंका काम बनानेके लिये और दैत्योंका मन एक नये कौतूहलकी ओर खींच लेनेके लिये ही मैंने वह स्त्रीरूप धारण किया था॥ १५॥✎ 733

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #733 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् ने → श्रीविष्णुभगवान्‌ने

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