॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.10.15
देवदानववीराणां ध्वजिन्यौ पाण्डुनन्दन।
रेजतुर्वीरमालाभिर्यादसामिव सागरौ॥ १५
devadānavavīrāṇāṃ dhvajinyau pāṇḍunandana|
rejaturvīramālābhiryādasāmiva sāgarau|| 15
अर्थ
परीक्षित्! उस समय रंग-बिरंगी पताकाओं, स्फटिक मणिके समान श्वेत निर्मल छत्रों, रत्नोंसे जड़े हुए दण्डवाले बहुमूल्य पंखों, मोरपंखों, चँवरों और वायुसे उड़ते हुए दुपट्टों, पगड़ी, कलँगी, कवच, आभूषण तथा सूर्यकी किरणोंसे अत्यन्त दमकते हुए उज्ज्वल शस्त्रों एवं वीरोंकी पंक्तियोंके कारण देवता और असुरोंकी सेनाएँ ऐसी शोभायमान हो रही थीं, मानो जल-जन्तुओंसे भरे हुए दो महासागर लहरा रहे हों॥ १३—१५॥