श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.1.30

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तत्रापि जज्ञे भगवान्हरिण्यां हरिमेधसः।

हरिरित्याहृतो येन गजेन्द्रो मोचितो ग्रहात्॥ ३०

tatrāpi jajñe bhagavānhariṇyāṃ harimedhasaḥ|

harirityāhṛto yena gajendro mocito grahāt|| 30

अर्थ

इस मन्वन्तरमें हरिमेधा ऋषिकी पत्‍नी हरिणीके गर्भसे हरिके रूपमें भगवान्‌ने अवतार ग्रहण किया। इसी अवतारमें उन्होंने ग्राहसे गजेन्द्रकी रक्षा की थी॥ ३०॥✎ 654

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #654 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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