श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.1.13

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स विश्‍वकायः पुरुहूत ईशः

सत्यः१ स्वयंज्योतिरजः पुराणः।

धत्तेऽस्य जन्माद्यजयाऽऽत्मशक्‍त्या

तां२ विद्ययोदस्य निरीह आस्ते॥ १३

sa viśvakāyaḥ puruhūta īśaḥ

satyaḥ svayaṃjyotirajaḥ purāṇaḥ|

dhatte'sya janmādyajayā''tmaśaktyā

tāṃ vidyayodasya nirīha āste|| 13

अर्थ

वही परमात्मा विश्‍वरूप हैं। उनके अनन्त नाम हैं। वे सर्वशक्तिमान् सत्य, स्वयंप्रकाश, अजन्मा और पुराणपुरुष हैं। वे अपनी मायाशक्तिके द्वारा ही विश्‍वसृष्टिके जन्म आदिको स्वीकार कर लेते हैं और अपनी विद्याशक्तिके द्वारा उसका त्याग करके निष्क्रिय, सत्स्वरूपमात्र रहते हैं॥ १३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सर्वस्य गोप्ता त्वजरः पुराणः।

    (मुद्रित पृष्ठ 907)
  2. २

    प्रा० पा०—तं वै विदित्वा तु।

    (मुद्रित पृष्ठ 907)

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