॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.1.12
न४ यस्याद्यन्तौ मध्यं च स्वः परो नान्तरं बहिः।
विश्वस्यामूनि यद् यस्माद् विश्वं च तदृतं महत्॥ १२
na yasyādyantau madhyaṃ ca svaḥ paro nāntaraṃ bahiḥ|
viśvasyāmūni yad yasmād viśvaṃ ca tadṛtaṃ mahat|| 12
अर्थ
जिनका न आदि है न अन्त, फिर मध्य तो होगा ही कहाँसे? जिनका न कोई अपना है और न पराया और न बाहर है न भीतर, वे विश्वके आदि, अन्त, मध्य, अपने-पराये, बाहर और भीतर—सब कुछ हैं। उन्हींकी सत्तासे विश्वकी सत्ता है। वही अनन्त वास्तविक सत्य परब्रह्म हैं॥ १२॥
टिप्पणियाँ
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प्राचीन प्रतिमें ‘न यस्याद्यन्तौ...’ से लेकर ‘...तदृतं महत्’ यहाँतकका पाठ इस प्रकार है—‘न यस्यादिस्तथा मध्यं देवदेवस्य चात्मनः। सर्वस्य मूलभूतोऽसौ भूता येऽनन्तरं यतः॥’