श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.1.10

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

आत्मावास्यमिदं विश्‍वं यत् किञ्चिज्जगत्यां जगत्।

तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ १०

ātmāvāsyamidaṃ viśvaṃ yat kiñcijjagatyāṃ jagat|

tena tyaktena bhuṃjīthā mā gṛdhaḥ kasyasviddhanam|| 10

अर्थ

यह सम्पूर्ण विश्‍व और इस विश्‍वमें रहनेवाले समस्त चर-अचर प्राणी—सब उन परमात्मासे ही ओतप्रोत हैं। इसलिये संसारके किसी भी पदार्थमें मोह न करके उसका त्याग करते हुए ही जीवन-निर्वाहमात्रके लिये उपभोग करना चाहिये। तृष्णाका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। भला, ये संसारकी सम्पत्तियाँ किसकी हैं?॥ १०॥

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